

कोटद्वार – उत्तराखंड के कोटद्वार में एक साइन बोर्ड से ‘बाबा’ नाम हटाए जाने को लेकर उस समय विवाद खड़ा हो गया, जब बजरंग दल से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं ने एक मुस्लिम दुकानदार द्वारा दुकान के बोर्ड से ‘बाबा’ शब्द हटाने को अपनी धार्मिक पहचान से जोड़ते हुए हंगामा किया। इस घटनाक्रम ने स्थानीय स्तर पर सामाजिक सौहार्द और भाषायी समझ को लेकर बहस छेड़ दी है।
मामले में विरोध दर्ज कराते हुए दीपक कुमार ने खुद को मोहम्मद दीपक बताते हुए साफ शब्दों में कहा कि संबंधित दुकानदार पिछले करीब 30 वर्षों से उसी स्थान पर शांतिपूर्वक व्यवसाय कर रहे हैं और अब एक सामान्य शब्द को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ‘बाबा’ किसी एक धर्म की बपौती नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और भाषायी शब्द है, जिसका प्रयोग सदियों से विभिन्न समुदायों में होता आ रहा है।
आपको बता दे ‘बाबा’ शब्द की वास्तविक उत्पत्ति क्या है ? भाषाविदों और इतिहासकारों के अनुसार ‘बाबा’ शब्द की जड़ें किसी एक धर्म तक सीमित नहीं हैं, इस शब्द का विरोध करने वाले बजरंग दल को भी यह पता नहीं होगा कि बाबा फ़ारसी शब्द है वही से यह शब्द सभी धर्म के लोगो में प्रचलित हो गया। इस शब्द को अकेले किसी धर्म से जोड़ना गलत है।
जैसे भारत में संस्कृत में ‘बाबा’ का प्रयोग पूज्य, वृद्ध या सम्माननीय व्यक्ति के लिए होता रहा है। फारसी और तुर्की भाषाओं में ‘बाबा’ का अर्थ पिता या बुजुर्ग होता है, जो सम्मान का सूचक है। अरबी और उर्दू में भी ‘बाबा’ शब्द बुजुर्ग, पीर या मार्गदर्शक के अर्थ में प्रचलित है।
भारत में ‘बाबा’ शब्द का प्रयोग हिंदू, मुस्लिम, सिख और अन्य समुदायों में समान रूप से देखा जाता है, चाहे वह बाबा फरीद, साईं बाबा, बाबा साहेब आंबेडकर, बाबा बुल्ले शाह या लोक जीवन में किसी बुजुर्ग के लिए संबोधन हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘बाबा’ एक सांस्कृतिक शब्द है, धार्मिक पहचान नहीं। इसे किसी एक मजहब से जोड़कर देखना ऐतिहासिक और भाषायी तथ्यों के विपरीत है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह के विवाद आपसी भाईचारे को नुकसान पहुंचाते हैं। कोटद्वार जैसे शांत शहर में वर्षों से व्यापार कर रहे दुकानदार को निशाना बनाना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि यह समाज में अनावश्यक तनाव भी पैदा करता है।
दीपक कुमार ने प्रशासन से अपील की, कि मामले को तथ्यों और कानून के आधार पर देखा जाए और किसी भी समुदाय के प्रति भेदभाव न होने दिया जाए। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की पहचान हमेशा से देवभूमि के साथ-साथ सौहार्द और सहिष्णुता की रही है।
फिलहाल यह विवाद स्थानीय चर्चा का विषय बना हुआ है, वहीं समझदार नागरिक इसे भाषायी और सांस्कृतिक दृष्टि से देखने की अपील कर रहे हैं, ताकि सामाजिक एकता बनी रहे और किसी भी तरह की गलतफहमी को बढ़ावा न मिले।
मामले में विरोध दर्ज कराते हुए दीपक कुमार ने खुद को मोहम्मद दीपक बताते हुए साफ शब्दों में कहा कि संबंधित दुकानदार पिछले करीब 30 वर्षों से उसी स्थान पर शांतिपूर्वक व्यवसाय कर रहे हैं और अब एक सामान्य शब्द को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ‘बाबा’ किसी एक धर्म की बपौती नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और भाषायी शब्द है, जिसका प्रयोग सदियों से विभिन्न समुदायों में होता आ रहा है।
आपको बता दे ‘बाबा’ शब्द की वास्तविक उत्पत्ति क्या है ? भाषाविदों और इतिहासकारों के अनुसार ‘बाबा’ शब्द की जड़ें किसी एक धर्म तक सीमित नहीं हैं, इस शब्द का विरोध करने वाले बजरंग दल को भी यह पता नहीं होगा कि बाबा फ़ारसी शब्द है वही से यह शब्द सभी धर्म के लोगो में प्रचलित हो गया। इस शब्द को अकेले किसी धर्म से जोड़ना गलत है।
जैसे भारत में संस्कृत में ‘बाबा’ का प्रयोग पूज्य, वृद्ध या सम्माननीय व्यक्ति के लिए होता रहा है। फारसी और तुर्की भाषाओं में ‘बाबा’ का अर्थ पिता या बुजुर्ग होता है, जो सम्मान का सूचक है। अरबी और उर्दू में भी ‘बाबा’ शब्द बुजुर्ग, पीर या मार्गदर्शक के अर्थ में प्रचलित है।
भारत में ‘बाबा’ शब्द का प्रयोग हिंदू, मुस्लिम, सिख और अन्य समुदायों में समान रूप से देखा जाता है, चाहे वह बाबा फरीद, साईं बाबा, बाबा साहेब आंबेडकर, बाबा बुल्ले शाह या लोक जीवन में किसी बुजुर्ग के लिए संबोधन हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘बाबा’ एक सांस्कृतिक शब्द है, धार्मिक पहचान नहीं। इसे किसी एक मजहब से जोड़कर देखना ऐतिहासिक और भाषायी तथ्यों के विपरीत है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह के विवाद आपसी भाईचारे को नुकसान पहुंचाते हैं। कोटद्वार जैसे शांत शहर में वर्षों से व्यापार कर रहे दुकानदार को निशाना बनाना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि यह समाज में अनावश्यक तनाव भी पैदा करता है।
दीपक कुमार ने प्रशासन से अपील की, कि मामले को तथ्यों और कानून के आधार पर देखा जाए और किसी भी समुदाय के प्रति भेदभाव न होने दिया जाए। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की पहचान हमेशा से देवभूमि के साथ-साथ सौहार्द और सहिष्णुता की रही है।
फिलहाल यह विवाद स्थानीय चर्चा का विषय बना हुआ है, वहीं समझदार नागरिक इसे भाषायी और सांस्कृतिक दृष्टि से देखने की अपील कर रहे हैं, ताकि सामाजिक एकता बनी रहे और किसी भी तरह की गलतफहमी को बढ़ावा न मिले।





















