

– श्रीमती उषा सिंह ने राजनीतिक पृष्ठ्भूमि के बाद भी गृहणी और सामाजिक दायित्व को कैसे निभाया ?
– सामाजिक काम करके उन्हें सुखद एहसास होता है।
– एक संस्था बनाकर सामाजिक गतिविधि का दायरा बढ़ाने की है इच्छा।
– नाहिद खान की श्रीमती उषा सिंह से खास बातचीतकिच्छा – यह है उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जिले के किच्छा नगर की श्रीमती उषा सिंह जिनकी उम्र लगभग 69 साल है, लेकिन इनके भीतर काम करने का ज़ज़्बा इनको उम्र के इस पड़ाव में भी नहीं रोक पा रहा है। इनके पिता स्व० कर्नल अमर बहादुर सिंह महानक्रांतिकारी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज में शामिल रहे है। इनके पति वीर मानवेन्द्र सिंह राजनीतिक रूप से चर्चित चेहरा है। जो उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री स्व० नारायण दत्त तिवारी के सबसे करीबी माने जाते थे।

अब पति वीर मानवेन्द्र सिंह राजनीतिक में उतने सक्रिय नहीं है, लेकिन श्रीमती उषा सिंह ने अपने इतने वर्षो तक गृहणी वाले रूप को बदल कर नये अवतार के रूप में सक्रियता दिखानी शुरू की है। श्रीमती उषा सिंह बताती है कि उन्होंने चार बेटियों की परवरिश करने के लिये काफी संघर्ष किया है। अपनी माँ की भूमिका का फ़र्ज़ पूरा किया, बच्चो की पढाई के लिये उन्होंने बरेली, नैनीताल से लेकर अमेरिका तक का सफर तय किया है।
श्रीमती उषा सिंह को एक बार न चलने की वजह से खुद को असहाय महसूस करना पड़ा था। लेकिन उन्होंने हार मानना नहीं सीखा, अपने घुटनो को बदलवाया और फिर पहले से ज़्यादा मज़बूती से खड़ी हो गई। अपने कामो की गति दुगनी कर दी और खुद को सक्रिय कर लिया। एक तरफ वो अपनी खेती भी संभालती है, तो दूसरी तरफ पैट्रोल पम्प का व्यवसाय भी संभाल रही है। उन्होंने खुद के भीतर ऊर्जा और शक्ति का संचार कर लिया है।

श्रीमती उषा सिंह आस्तिक है और उन्हें ईश्वर पर पूरा भरोसा है, वो कहती है कि आप कर्म करते रहिये आपको फल ईश्वर ज़रूर देगा। इस लिये ही वो हमेशा गरीबो, निर्धनों और बेसहाराओं की मदद में अपनी अग्रणी भूमिका निभाती रहती है। ईश्वर के आशीर्वाद से वो सब कुछ कर पा रही है।
यही नहीं, श्रीमती उषा सिंह को पता है कि कैसे उन्हें अपने परिवार का दायित्व भी निभाना है। इसके लिये भी वो पूरी निष्ठा से लगी रहती है, साथ ही वो सामाजिक कार्यो में भी खूब बढ़ चढ़ कर सक्रिय रहती है। अब उन्होंने खुद को सब कामो के लिए सहज कर लिया है कि कब उन्हें अपनी ज़िन्दगी में कौन सा किरदार निभाना है।
उनका कहना है कि ”परिवारिक और सामाजिक दायित्वो के साथ ही व्यवसायिक कामो में समाज में महिला का सीधे सीधे हस्तक्षेप गलत माना जाता था। लेकिन आज महिलाये भी मज़बूत होकर पुरुषो के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। उनका सभी क्षेत्रों में योगदान है, यह नया परिवर्तन समाज में महिलाओ की नई सशक्त भूमिका को उभार रहा है। महिलाओ के जीने का अंदाज़ अब बदल गया है वो अब कैद नहीं है,आज़ाद है । ”





















