– नाहिद खानपंतनगर/ऊधम सिंह नगर – उत्तराखंड में लावारिस गोवंश की समस्या से निपटने और गोवंश संरक्षण को नई दिशा देने के लिए पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय एक महत्वपूर्ण पहल करने जा रहा है। विश्वविद्यालय परिसर में करीब 65 एकड़ भूमि पर ‘भारत रत्न नानाजी देशमुख गोवंश संवर्धन एवं अनुसंधान’ योजना के तहत व्यापक स्तर पर काम किया जा रहा है।
इस योजना का उद्देश्य केवल लावारिस गोवंश को आश्रय देना नहीं, बल्कि गोवंश आधारित एक ऐसा मॉडल विकसित करना है, जो संरक्षण, अनुसंधान और आर्थिक आत्मनिर्भरता को एक साथ जोड़ सके।
प्रस्तावित योजना के पहले चरण में करीब एक हजार लावारिस गोवंश को संरक्षण देने की तैयारी है। इसके बाद योजना का विस्तार करते हुए करीब पांच हजार गोवंश को इसके दायरे में लाने की योजना है।

विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि बड़े स्तर पर संरक्षण की व्यवस्था विकसित होने से सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर लावारिस घूमने वाले गोवंश की संख्या को कम करने में मदद मिल सकती है।
लावारिस गोवंश का सड़कों पर घूमना केवल पशु संरक्षण का विषय नहीं है, बल्कि यह सड़क सुरक्षा से भी जुड़ी गंभीर समस्या है। हाईवे और शहरों की सड़कों पर अचानक सामने आने वाले पशुओं की वजह से वाहन चालक कई बार नियंत्रण खो देते हैं।
ऐसे हादसों में गोवंश खुद भी घायल होते हैं या उनकी मौत हो जाती है। वहीं दूसरी ओर वाहन चालकों और राहगीरों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा होता है। सड़क दुर्घटनाओं में लोग घायल होते हैं और कई मामलों में मानवीय जीवन की भी क्षति होती है। ऐसे में पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय की यह योजना गोवंश संरक्षण के साथ-साथ सड़क सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकती है।
योजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में किया जा रहा प्रयास है। विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.के. कश्यप के अनुसार, गोवंश पर किए गए शोध से यह सामने आया है कि गोबर और गोमूत्र से विभिन्न उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।

इन्हीं संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए योजना में गोबर और गोमूत्र से उपयोगी उत्पाद तैयार करने तथा उससे होने वाली आय को गोवंश के संरक्षण और देखभाल में इस्तेमाल करने की दिशा में काम किया जा रहा है। इससे संरक्षण केंद्र पर आने वाला पूरा खर्च केवल बाहरी संसाधनों पर निर्भर न रहे और गोवंश संरक्षण की व्यवस्था को स्वावलंबी मॉडल के रूप में विकसित किया जा सके।
विश्वविद्यालय के मुताबिक, भविष्य में यदि इस मॉडल का विस्तार होता है और गोवंश से जुड़े उत्पादों के जरिए आर्थिक गतिविधियां मजबूत होती हैं, तो इसका असर पशुपालकों पर भी पड़ सकता है।
वर्तमान में कई जगहों पर उपयोगिता कम होने या देखभाल का खर्च अधिक होने के कारण पशुओं को लावारिस छोड़ने की समस्या सामने आती है। ऐसे में गोवंश से आर्थिक रूप से उपयोगी उत्पाद तैयार करने का मॉडल पशुपालकों को इन्हें अपने पास रखने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है।
पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय की इस पहल को केवल स्थानीय स्तर तक सीमित रखने के बजाय भविष्य में इसके विस्तार की योजना है। पहले चरण में एक हजार और उसके बाद पांच हजार गोवंश के संरक्षण के लक्ष्य को हासिल करने के बाद इस मॉडल का व्यापक स्तर पर अध्ययन किया जाएगा। यदि मॉडल निर्धारित उद्देश्यों के अनुरूप सफल रहता है, तो इसे देश के अन्य हिस्सों में भी लागू करने की दिशा में आगे बढ़ाया जा सकता है।
पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.के. कश्यप के अनुसार, योजना का उद्देश्य गोवंश संरक्षण के साथ-साथ अनुसंधान और उपयोगी उत्पादों के माध्यम से इसे आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है। विश्वविद्यालय में गोबर और गोमूत्र से उपयोगी उत्पाद तैयार करने की संभावनाओं पर भी काम किया जा रहा है।
कुल मिलाकर, पंतनगर में प्रस्तावित ‘भारत रत्न नानाजी देशमुख गोवंश संवर्धन एवं अनुसंधान’ योजना गोवंश संरक्षण को सड़क सुरक्षा, अनुसंधान और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ने की कोशिश है। आने वाले समय में यह मॉडल किस तरह आकार लेता है और इसका विस्तार किस स्तर तक होता है, इस पर अब नजर रहेगी।

















