| इंडिया नज़र ब्यूरो रुद्रपुर – केंद्र सरकार द्वारा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार किए जाने के बाद देशभर में इस फैसले पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। इसी क्रम में समाजसेवी एवं युवा नेता सुशील गाबा ने इसे लोकतंत्र और छात्र शक्ति की बड़ी जीत बताते हुए कहा कि जिस सरकार में लंबे समय तक किसी बड़े मंत्री का इस्तीफा नहीं हुआ, वहां आखिरकार जनता और छात्रों की आवाज़ के आगे सरकार को झुकना पड़ा।
सुशील गाबा ने कहा कि किसान आंदोलन के दबाव में केंद्र सरकार को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े थे और अब शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी इस बात का संकेत है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ को हमेशा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि इसे केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि देशभर के लाखों छात्रों के संघर्ष और उनके धैर्य की जीत के रूप में देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की कमियों और लगातार सामने आ रही परीक्षा संबंधी अनियमितताओं से देश का युवा बेहद आक्रोशित था। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, पारदर्शिता की कमी और भविष्य को लेकर बढ़ती अनिश्चितता ने छात्रों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया। यही असंतोष धीरे-धीरे एक बड़े छात्र आंदोलन में बदल गया।
सुशील गाबा ने कहा कि यदि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जाएगा तो ऐसे जनआंदोलनों को रोका नहीं जा सकता। देश के युवाओं ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि वे अपने अधिकारों और भविष्य से जुड़े मुद्दों पर अब चुप नहीं बैठेंगे।
उन्होंने सरकार से मांग करते हुए कहा कि अब केवल मंत्री का इस्तीफा पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था में व्यापक और स्थायी सुधार किए जाएं। ऐसी परीक्षा प्रणाली विकसित की जाए जो पूरी तरह लीकप्रूफ, पारदर्शी और जवाबदेह हो, ताकि मेहनत करने वाले छात्रों का भविष्य सुरक्षित रह सके।
उन्होंने कहा कि परीक्षा में गड़बड़ियों और अव्यवस्था के कारण कई छात्रों पर मानसिक दबाव बढ़ता है और कुछ मामलों में वे आत्मघाती कदम तक उठा लेते हैं। ऐसी घटनाएं किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय हैं।
अपने बयान के अंत में सुशील गाबा ने कहा कि “इस्तीफा किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि उस समस्या की स्वीकृति होता है। वास्तविक समाधान तभी होगा, जब ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिसमें किसी भी छात्र को परीक्षा प्रणाली की खामियों के कारण अपना भविष्य दांव पर न लगाना पड़े और न ही किसी परिवार को अपने बच्चे को खोने का दर्द सहना पड़े।”




















