| इंडिया नज़र ब्यूरो,पंतनगर – पंतनगर की संजय कॉलोनी और मस्जिद कॉलोनी में रहने वाले सैकड़ों परिवार इन दिनों गहरे डर और अनिश्चितता के साए में जी रहे हैं। जिन घरों में पीढ़ियां पली-बढ़ीं, जहां खुशियों और संघर्षों की कहानियां बसी हैं, आज वही आशियाने उजड़ने के कगार पर खड़े हैं।
विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा अतिक्रमण का नोटिस जारी किए जाने के बाद पूरा मामला अब भावनात्मक और सामाजिक मुद्दा बन गया है। 60-65 वर्षों से इन कॉलोनियों में रह रहे परिवारों को अचानक 13 अप्रैल को घर खाली करने का नोटिस मिला, जिसमें 30 अप्रैल तक मकान खाली करने का अल्टीमेटम दिया गया है।
इस खबर ने जैसे ही कॉलोनीवासियों का कहना है कि उनके पास वोटर आईडी, राशन कार्ड, स्थायी निवास प्रमाण पत्र, बिजली बिल जैसे सभी दस्तावेज मौजूद हैं, जो उनके वर्षों से यहां बसे होने की गवाही देते हैं। उनका दर्द साफ झलकता है,“अगर हम अतिक्रमणकारी हैं, तो इतने सालों तक हमें यहां रहने क्यों दिया गया?”

इसी पीड़ा को लेकर सैकड़ों लोग पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के नेतृत्व में पहुंचे और अपर जिलाधिकारी पंकज उपाध्याय को ज्ञापन सौंपा। उनकी एक ही मांग है, “पहले पुनर्वास, फिर कोई कार्रवाई”।
कलेक्ट्रेट परिसर में उस वक्त माहौल बेहद भावुक हो गया, जब कई महिलाओं की आंखों में आंसू थे और बुजुर्ग अपने घर बचाने की गुहार लगा रहे थे। यह सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व और सम्मान का सवाल बन चुका है।
पूर्व विधायक राजेश शुक्ला का कहना है कि “ये सिर्फ मकान नहीं हैं, ये सैकड़ों परिवारों के सपनों का घर है… इन दीवारों में उनके बच्चों की हंसी, बुजुर्गों की यादें और उनकी पूरी जिंदगी बसती है। मैं प्रशासन से साफ कहना चाहता हूं, मेरे रहते एक भी गरीब परिवार को बिना पुनर्वास के उजाड़ने नहीं दिया जाएगा। अगर सरकार को कोई कार्रवाई करनी है, तो पहले इन लोगों के रहने की वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट भी साफ कह चुका है कि वर्षों से बसे लोगों को बिना पुनर्वास के नहीं हटाया जा सकता। हल्द्वानी के वनभूलपुरा और बिंदुखत्ता में भी सरकार ने संवेदनशीलता दिखाई है, तो यहां क्यों नहीं? ये लोग अतिक्रमणकारी नहीं, बल्कि इस क्षेत्र के वर्षों पुराने निवासी हैं। इनका हक छीना नहीं जा सकता। मैं इस मुद्दे को शासन स्तर तक मजबूती से उठाऊंगा और जब तक इन परिवारों को न्याय नहीं मिलता, मैं इनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहूंगा।”
संजय कॉलोनी और मस्जिद कॉलोनी का यह मामला अब सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रहा, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और अधिकारों की लड़ाई बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार और प्रशासन इन सैकड़ों परिवारों के आंसुओं को समझते हैं या नहीं।





















