
- चकबंदी विभाग की मिलीभगत से हड़पी सरकारी भूमि
- अब अरविंदर सिंह चीमा की भूमि हड़पना चाहते है
– इंडिया नज़र ब्यूरो
रुद्रपुर – चकबंदी विभाग के नये नये कारनामे सामने आ रहे है,लेकिन तमाम शिकायतों के बाद भी पीड़ितों को कोई न्याय देने वाला नहीं है। अभी किच्छा के एक व्यक्ति की फ़र्ज़ी पत्रावली बनाकर ज़मीन हड़पने और न्यायालयों को धोखा देने के मामले के बाद ग्राम कोलडा में फर्जीवाड़ा करके सरकारी ज़मीन को चकबंदी विभाग की मिलीभगत से अपने नाम करने का मामला प्रकाश में आया है।
जिलाधिकारी को भेजे दिये गये शिकायती पत्र में ग्राम कोलड़ा,कीरतपुर के किसान अरविंदर सिंह चीमा ने आरोप लगाया है कि चकबंदी विभाग की मिलीभगत से खेत नंबर 37 की 18 बीघा 4 बिस्वा सरकारी ज़मीन को जो 1960 में ग्राम समाज में दर्ज कर ली गई थी। उसे फर्जीबाड़ा करने वाले मृतक किसान जगतू प्रसाद ने अपने नाम दर्ज करवा लिया था।
जगतू प्रसाद ने फर्जीबाड़ा करने के लिये बाकायदा राम किशन के नाम से एक फ़र्ज़ी दस्तरबरदारी दिनाक-30 दिसंबर1963 बनाई। जिसपर राम किशन राम के हस्ताक्षर भी नहीं थे.इसमें राम किशन राम से खेत नंबर 37 के 75/3 बीघा ज़मीन पर काश्तकार चले आने और जगतू प्रसाद का कब्ज़ा आठ दस साल काबिज़ काश्त बताया गया है। इसी के आधार पर भूमि अपने नाम दर्ज करवा ली थी। इसमें चकबंदी विभाग ने रिकार्ड की छानबीन नहीं की और अनदेखी करके आदेश कर दिया।

जबकि वास्तविकता यह है कि जगतू प्रसाद की 1963 में मात्र 45 बीघा ही भूमि बची थी,फिर जगतू प्रसाद का कब्ज़ा 75 बीघा पर कैसे हो गया ? दस्तरबरदारी के आधार पर नवीन परती की भूमि जो 30 बीघा 4 बिस्वा थी, उसे अपने नाम कराया गया था।
दरअसल लगभग साठ साल पहले ग्राम के जगतू प्रसाद को 94 बीघा ज़मीन एलाट की गई थी। इस भूमि में काफी ज़मीन बंजर और ऊबड़खाबड़ थी। जिसके कारण खेत नंबर- 37 से 30 बीघा 4 विस्वा और खेत नंबर 41 से 18 बीघा कुल 49 बीघा ज़मीन सरकार के पक्ष में सरेंडर करके उसके बदले खेत नंबर-37 अ,38,42,43 व 73 में कुल 94 बीघा यानी 15 एकड़ प्राप्त कर ली थी।

जगतू की सरेंडर की गई खेत नंबर-41 की 18 बीघा भूमि गब्बू सिंह को एलाट कर दी गई थी। जबकि सरेंडर की गई खेत नंबर-37 की 30 बीघा 4 विस्वा भूमि नवीन परती में दर्ज कर ली गई थी। लेकिन चकबंदी विभाग ने करोडो रूपये की सरकारी भूमि को मिलीभगत से खुर्दबुर्द होने दिया था।
यही नहीं, सरेंडर की गई खेत नंबर 37 की नवीन परती 30 बीघा 4 बिस्वा ज़मीन में से राम किशन राम को12 बीघा ज़मीन एलाट की गई थी। जब राम किशन राम को इस भूमि पर भूमिधरी अधिकार प्राप्त हुए तो 1971 में इस भूमि को शिकायतकर्ता अरविंदर सिंह चीमा के पिता राजेंद्र सिंह को 1971 में रजिस्ट्री कर दी गई थी। जिसका दाखिल ख़ारिज भी हो चुका है। अब इस भूमि को जगतू प्रसाद के न रहने पर उसके पोते दादा के किये फर्जीबाड़े से हड़पना चाहते है।
पहले दादा यानी जगतू प्रसाद ने इस फर्जीबाड़े का जाल बुना उनकी मृत्यु होने के बाद जगतू प्रसाद के पुत्र बुद्धि राम ने इसे आगे बढ़ाया। उनकी मृत्यु होने के बाद अब जगतू प्रसाद के पोते इस फर्जीबाड़े से करोडो की सरकारी ज़मीन तो हड़पे ही बैठे है साथ ही राम किशन राम की मिली ज़मीन जिसे उसने बेच दिया था उसपर भी कब्ज़ा करने के कानूनी दावपेच चल रहे है।
देखना यह है कि चकबंदी की इन गलतियों की सज़ा दो पीढ़ियों के बाद कितनी और पीढ़ियों को भुगतनी पड़ेगी ? या इसपर कोई न्याय करेगा, यह यक्ष प्रश्न है।





















