
-संजय नागपाल
बिहार विधानसभा चुनावों के परिणाम 10 नवंबर को आने वाले हैं।शायद इसीलिए मीडिया चैनलों ने अपने अभी तक के कथनों पर अचानक यू टर्न ले लिया है।पहले चुनावों में हार या जीत राजनीतिक दलों की हुआ करती थी।लेकिन धराशायी होने के डर से खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अपनी तो भद्द ही पिटवा ली।

ऐसा लगता है कि सभी मीडिया चैनलों के लोगों को पता था कि बिहार में चुनावी वास्तविक स्थिति क्या थी।पर मालिक की वफ़ादारी तो इन्हें करनी ही थी।पत्रकारिता के मूल्यों से इन्हें कोई सरोकार नही..बस पेट की खातिर इन्होंने सब कुछ ताक पर रख दिया। अब जबकि दो दिन बाद चुनावों के परिणाम आने हैं तो लानतें, मलामतें न मिले इसलिए पेड एजेंडे को छोड़कर वास्तविक वस्तु स्थिति की ओर ये चाटुकार ध्यान केंद्रित करने लगे हैं।इनका मुख्य मक़सद कैसे ही अपनी इज़्ज़त बचाना है कि हमने परिणामों से पूर्व ही बता दिया था कि इस बार महागठबंधन ज़्यादा मज़बूत रहेगा।
कुल मिलाकर मतदान होने तक एक राजनीतिक दल की चाटुकारिता कर माहौल बनाने वाले मीडिया चैनलों ने, चुनाव परिणामों से पूर्व ही एग्जिट पोल के जरिये विपरीत परिणाम घोषित कर दूसरे राजनीतिक दलों के साथ जुगलबंदी शुरू कर दी है..अब यहाँ बड़ा सवाल यह है कि इन न्यूज़ चैनलों को पत्रकारिता के मूल्यों को कौन समझायेगा..?
वैसे अगर थोड़ी भी अक्ल इनमें होगी तो इन विधानसभा चुनावों से एक मैसेज स्पष्ट मिलता है कि आपको माहौल बनाने का अधिकार जनता ने कभी नही दिया।अपनी विश्वसनीयता को बनाये रखने के लिए अभी भी वक़्त है। पत्रकारिता के मूल्यों को बनाकर रखें। सरकारें तो आती जाती रहती है।भारतीय राजनीति में राजनीतिक दल तो किंग मेकर की भूमिका में हो सकते हैं पर मीडिया कभी किंग मेकर नही हो सकता। जाग जाओ..अभी भी वक़्त है…





















