


– विक्की रस्तोगी, एडवोकेट
नई दिल्ली – दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच चल रहे वैवाहिक विवाद का हवाला देकर पत्नी को पति की मृत्यु के बाद मिलने वाली फैमिली पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस मधु जैन की खंडपीठ ने कहा: “याचिकाकर्ता द्वारा मृतक पति से भरण-पोषण के लिए आवेदन दाखिल करना यह दर्शाता है कि दोनों के बीच वैवाहिक विवाद था। लेकिन जब तक इसका परिणाम तलाक़ के रूप में सामने नहीं आया तब तक याचिकाकर्ता को पारिवारिक पेंशन देने से इनकार नहीं किया जा सकता।”

मामला सोनी देवी बनाम भारत संघ का है, सोनी देवी के पति का निधन वर्ष 2009 में हो गया। उन्होंने 2013 में फैमिली पेंशन का आवेदन दिया। केंद्र सरकार ने उनके दावे को खारिज कर दिया और कहा कि मृतक ने अपने परिवार की सूची में पत्नी का नाम नहीं जोड़ा था। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) ने फैमिली पेंशन देने का निर्देश तो दिया, लेकिन आवेदन की तारीख़ से।
सोनी देवी ने तर्क दिया कि ”उन्हें पति की मृत्यु की तारीख़ से ही पेंशन का हक़ है। हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका दायर करने में देरी होने मात्र से पत्नी का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता।”
अदालत ने निर्देश दिया कि ‘पत्नी को पति की मृत्यु की तारीख़ से ही पेंशन दी जाए और बकाया राशि चार माह के भीतर ब्याज़ सहित चुकाई जाए।’
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि पति द्वारा पत्नी का नाम परिवार सूची में न लिखना उसके विधिक अधिकार को खत्म नहीं करता। कोई अन्य वैध दावा न होने की स्थिति में वह पेंशन पाने की हकदार है।
अदालत ने सरकार की आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा कि आवेदन में देरी पत्नी के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकती। अदालत ने कहा, “हम मानते हैं कि इस आधार पर याचिकाकर्ता को पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।”























