


– कुमौड़ हिलजात्रा के अवसर पर मुख्यमंत्री ने किया वर्चुअल संबोधन
– हिमांशु तिवारीपिथौरागढ़ – जिले की सौर घाटी में उत्तराखंड की आस्था, संस्कृति और परंपरा का अद्वितीय संगम कुमौड़ हिलजात्रा परंपरागत उत्साह और धूमधाम के साथ संपन्न हुई। पांच शताब्दियों से लगातार मनाया जा रहा यह पर्व आज भी लोकजीवन और सामाजिक एकजुटता की मिसाल कायम करता है।
लोक संस्कृति का जीवन स्वरूप
हिलजात्रा समिति पिथौरागढ़ द्वारा आयोजित इस पर्व की शुरुआत महर भाइयों की वीरता की स्मृति में हुई थी। समय के साथ यह आस्था का उत्सव तो बना ही, साथ ही इसे कृषि पर्व के रूप में भी पहचान मिली। इस मौके पर गौरा–महेश की पूजा और सातू–आठू की परंपरा निभाई जाती है, जिसे हमारी लोक संस्कृति का जीवन स्वरूप माना जाता है।
लोक संस्कृति का जीवन स्वरूप
हिलजात्रा समिति पिथौरागढ़ द्वारा आयोजित इस पर्व की शुरुआत महर भाइयों की वीरता की स्मृति में हुई थी। समय के साथ यह आस्था का उत्सव तो बना ही, साथ ही इसे कृषि पर्व के रूप में भी पहचान मिली। इस मौके पर गौरा–महेश की पूजा और सातू–आठू की परंपरा निभाई जाती है, जिसे हमारी लोक संस्कृति का जीवन स्वरूप माना जाता है।
मुख्यमंत्री ने वर्चुअल दी शुभकामनाये
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोर घाटी की इस 500 वर्षों से चली आ रही ऐतिहासिक हिलजात्रा पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए इसके सफल संचालन हेतु कुमौड़ हिलजात्रा समिति को बधाई दी है।
मुख्यमंत्री ने अपने वर्चुअल संबोधन में कहा कि हिलजात्रा समिति पिथौरागढ़ द्वारा आयोजित आस्था और मनोरंजन का यह अद्वितीय संगम, पिछली पाँच शताब्दियों से अनवरत रूप से जारी, सौर घाटी की ऐतिहासिक पहचान बना हुआ है। उन्होंने आयोजकों को इस महोत्सव के सफल संचालन हेतु शुभकामनाएं दीं।

आस्था और शौर्य का संगम
कुमौड़ हिलजात्रा के दौरान महर भाइयों की शौर्यगाथा से जुड़े मुखौटे आकर्षण का केंद्र रहे। किसानों, बैलों, हालिया और पुतरिया के पारंपरिक स्वरूपों ने इस पर्व को लोकजीवन की गहराई से जोड़ा। विशेष रूप से लाखिया बाबा यानी भूत का स्वरूप दर्शकों और श्रद्धालुओं के बीच आस्था और उत्साह का मुख्य केंद्र बना रहा।

बदलते समय में भी परंपरा जीवित
हिलजात्रा पर्व ने यह साबित किया है कि तेजी से बदलते दौर में भी जब लोग अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं, तब सौर घाटी की जनता अपनी परंपराओं को संजोकर एक अनूठा उदाहरण पेश कर रही है। यह पर्व न केवल कृषि और ग्रामीण जीवन से जुड़ा है, बल्कि यह सामूहिकता, आस्था और लोक आस्था की शक्ति को भी दर्शाता है।
विरासत पर गर्व
500 वर्ष पुरानी इस परंपरा को संजोकर रखने की प्रतिबद्धता आज भी यहां के लोगों में स्पष्ट झलकती है। हिलजात्रा उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए अपनी जड़ों और विरासत पर गर्व करने की प्रेरणा देती है।

























